शीर्षक: आख़िरी घंटी

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शीर्षक: आख़िरी घंटी

शाम के ठीक पाँच बजे, पुराना सरकारी स्कूल हमेशा की तरह खाली हो चुका था। बरामदों में हवा सीटी बजा रही थी और टूटी खिड़कियों से ढलती धूप तिरछी रेखाओं की तरह फर्श पर फैल रही थी। लेकिन उस दिन चार दोस्त—आरव, सिया, नील और तृषा—वहीं रुक गए थे। वजह थी स्कूल की लाइब्रेरी, जो पिछले दस साल से बंद पड़ी थी।

कहते थे कि लाइब्रेरी में रात के समय “आख़िरी घंटी” बजती है—वही घंटी जो सालों पहले एक हादसे की रात बजी थी। उस रात एक छात्र रहस्यमय तरीके से गायब हो गया था। तब से लाइब्रेरी के दरवाज़े पर जंग लगा ताला है और अंदर धूल की मोटी परत।

“बस दस मिनट,” आरव ने कहा, “वीडियो बना लेते हैं और निकल जाते हैं।”

नील ने मोबाइल की टॉर्च ऑन की। ताले को किसी तरह तोड़ा गया। जैसे ही दरवाज़ा खुला, अंदर से बासी कागज़ और नमी की गंध बाहर आई। दीवारों पर टेढ़ी-मेढ़ी परछाइयाँ हिल रही थीं, मानो किताबें सांस ले रही हों।

अंदर कदम रखते ही तृषा को लगा कि किसी ने उसके कंधे को हल्के से छुआ। उसने मुड़कर देखा—कोई नहीं था।

लाइब्रेरी के बीचों-बीच एक पुरानी लकड़ी की मेज़ थी। उस पर एक घंटी रखी थी—काली, जंग लगी, और उसके पास एक धुंधला-सा नाम लिखा था: “राघव – 2016”

“ये वही साल है…” सिया की आवाज़ कांप गई।

अचानक दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया। तेज़ आवाज़ पूरे कमरे में गूंज उठी। चारों दोस्त घबरा गए। नील ने हैंडल खींचा—दरवाज़ा जाम था।

तभी, बिना किसी के छुए, मेज़ पर रखी घंटी हिलने लगी।

टन्… टन्… टन्…

घंटी की आवाज़ कानों में चुभ रही थी। मोबाइल की टॉर्च झिलमिलाने लगी। रोशनी के बीच उन्होंने देखा—किताबों की अलमारियों के पीछे कोई खड़ा है। सफ़ेद शर्ट, स्कूल की यूनिफॉर्म, और चेहरा धुंधला।

“तुम… कौन हो?” आरव ने हिम्मत जुटाई।

आकृति धीरे-धीरे आगे बढ़ी। उसका चेहरा अब साफ़ दिख रहा था—आंखें पूरी तरह काली, जैसे भीतर कोई रोशनी नहीं। होंठों पर अजीब-सी मुस्कान।

“तुमने मेरी घंटी बजाई…” आवाज़ फुसफुसाहट जैसी थी, लेकिन हर कोने से गूंज रही थी।

सिया रोने लगी। “हम बस देखने आए थे…”

“मैं भी बस देखने आया था… उस रात…” आकृति ने कहा। “पर किसी ने दरवाज़ा बंद कर दिया। घंटी बजती रही… कोई नहीं आया…”

कमरे का तापमान अचानक गिर गया। चारों की सांसें धुंध बनकर बाहर आने लगीं।

“तुम लोग जाओगे… या यहीं रहोगे… अगली घंटी तक?” उसने हाथ बढ़ाया। उसकी उंगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

तृषा ने हिम्मत करके मेज़ पर रखी घंटी को जोर से उठाया और ज़मीन पर पटक दिया। घंटी दो टुकड़ों में टूट गई। उसी क्षण एक तीखी चीख गूंजी। अलमारियाँ हिलने लगीं। दरवाज़ा अचानक खुल गया।

चारों बिना पीछे देखे दौड़ पड़े। बाहर आकर जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा—लाइब्रेरी का दरवाज़ा फिर से बंद था, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

अगले दिन स्कूल में खबर फैली—लाइब्रेरी की घंटी फिर से मेज़ पर रखी मिली… बिल्कुल सही-सलामत।

और उसके पास अब चार नए नाम लिखे थे।

आरव। सिया। नील। तृषा।

उस शाम पाँच बजे… आख़िरी घंटी फिर बजी। 🔔

अंदर कदम रखते ही तृषा को लगा कि किसी ने उसके कंधे को हल्के से छुआ। उसने मुड़कर देखा—कोई नहीं था।

लाइब्रेरी के बीचों-बीच एक पुरानी लकड़ी की मेज़ थी। उस पर एक घंटी रखी थी—काली, जंग लगी, और उसके पास एक धुंधला-सा नाम लिखा था: “राघव – 2016”

“ये वही साल है…” सिया की आवाज़ कांप गई।

अचानक दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया। तेज़ आवाज़ पूरे कमरे में गूंज उठी। चारों दोस्त घबरा गए। नील ने हैंडल खींचा—दरवाज़ा जाम था।

तभी, बिना किसी के छुए, मेज़ पर रखी घंटी हिलने लगी।

टन्… टन्… टन्…

घंटी की आवाज़ कानों में चुभ रही थी। मोबाइल की टॉर्च झिलमिलाने लगी। रोशनी के बीच उन्होंने देखा—किताबों की अलमारियों के पीछे कोई खड़ा है। सफ़ेद शर्ट, स्कूल की यूनिफॉर्म, और चेहरा धुंधला।

“तुम… कौन हो?” आरव ने हिम्मत जुटाई।

आकृति धीरे-धीरे आगे बढ़ी। उसका चेहरा अब साफ़ दिख रहा था—आंखें पूरी तरह काली, जैसे भीतर कोई रोशनी नहीं। होंठों पर अजीब-सी मुस्कान।

“तुमने मेरी घंटी बजाई…” आवाज़ फुसफुसाहट जैसी थी, लेकिन हर कोने से गूंज रही थी।

सिया रोने लगी। “हम बस देखने आए थे…”

“मैं भी बस देखने आया था… उस रात…” आकृति ने कहा। “पर किसी ने दरवाज़ा बंद कर दिया। घंटी बजती रही… कोई नहीं आया…”

कमरे का तापमान अचानक गिर गया। चारों की सांसें धुंध बनकर बाहर आने लगीं।

“तुम लोग जाओगे… या यहीं रहोगे… अगली घंटी तक?” उसने हाथ बढ़ाया। उसकी उंगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

तृषा ने हिम्मत करके मेज़ पर रखी घंटी को जोर से उठाया और ज़मीन पर पटक दिया। घंटी दो टुकड़ों में टूट गई। उसी क्षण एक तीखी चीख गूंजी। अलमारियाँ हिलने लगीं। दरवाज़ा अचानक खुल गया।

चारों बिना पीछे देखे दौड़ पड़े। बाहर आकर जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा—लाइब्रेरी का दरवाज़ा फिर से बंद था, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

अगले दिन स्कूल में खबर फैली—लाइब्रेरी की घंटी फिर से मेज़ पर रखी

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